Friday, April 19, 2019

जेट एयरवेज़ के सैकड़ों कर्मचारियों ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया

एयरलाइन पर एक अरब डॉलर (तकरीबन 7000 करोड़ रुपये) से ज़्यादा का कर्ज़ है और स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के नेतृत्व वाले देनदारों ने कंपनी को इमरजेंसी कर्ज़ देने से इनकार कर दिया है.

एक वक्त था जेट एयरवेज़ 100 से ज़्यादा प्लेन उड़ाती थी और इसे भारत की नंबर वन एयरलाइन कहा जाता था.

लेकिन पिछले कुछ महीनों से जेट में आर्थिक परेशानियों की खबरें आने शुरू हो गई थीं और लोगों की सैलरी में देरी होनी लगी.

कर्ज़दारों के कर्ज़ न लौटा पाने के कारण एयरलाइन को अपनी अपनी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय उड़ानें रोक देनी पड़ीं.

जेट की आर्थिक चुनौतियों के लिए डॉलर के मुकाबले रुपए में कमज़ोरी, स्पाइस जेट, इंडिगो जैसी सस्ते किरायों वाली एयरलाइन्स से कंपीटीशन, तेल के दामों में उथल-पुथल जैसे कारणों को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है.

इसके अलावा जानकार एयर सहारा को खरीदने के फ़ैसले और मैनेजमेंट के काम करने के अंदाज़ को भी जेट की ख़राब आर्थिक हालात के लिए ज़िम्मेदार ठहराते हैं.

जेट एयरवेज़ के पे-रोल पर 16,000 कर्मचारी हैं. इसके अलावा करीब 6,000 कर्मचारी कॉन्ट्रैक्ट पर हैं.

गुरुवार को जेट एयरवेज़ के सैकड़ों कर्मचारियों और उनके परिवारों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया.

मेरे पति पिछले 22 सालों से जेट एयरवेज़ में काम कर रहे हैं.

मेरी मां कैंसर से पीड़ित है. मेरा बेटा नौवीं कक्षा में है. उसकी फ़ीस जमा नहीं हुई है.

मम्मी का ट्रीटमेंट बंद हो गया है. सरकार को कोई तो कदम लेना चाहिए. ऐसे नहीं चल सकता है - कि कोई कुछ भी करे और लंदन में बस जाए.

जेट का स्टाफ़ टेंशन और डिप्रेशन में है. वो लोग शायद ठंडे दिमाग़ से प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन हम घरवाले ऐसा नहीं कर पा रहे हैं.

मोदी जी प्लीज़ कुछ कीजिए. ये जो हम देख रहे हैं वो अच्छे दिन हैं क्या? नरेश गोयल कहां हैं? उन्हें बुलाइए. ये सब मीडिया के सहारे चल रहा है. क्यों कोई सामने नहीं आ रहा है?

किंगफिशर के बाद जेट बंद होने वाला है... क्या ये मज़ाक बना कर रखा है? कुछ दिन बाद स्पाइस जेट और इंडिगो भी जाएंगे.

क्या करें? क्या खाएं? क्या रोड पर भीख मांगने जाएं? (जेट को बचाने के लिए) सभी कर्मचारी मदद करने के लिए तैयार हैं?

जेट एयरवेज़ को क्यों बंद किया जा रहा है? मेरे बच्चों की फीस नहीं जा रही है. मेरी बेटी इस बार 10वीं की परीक्षा देगी. उसके भविष्य का क्या होगा?

दो महीने फीस नहीं देंगे तो उसे स्कूल से निकाल दिया जाएगा.

मोदी सरकार को, नरेश गोयल को सामने बुलाओ. हमें सारी ख़बरें मीडिया के माध्यम से क्यों मिल रही हैं.

अगर हमारा कोई फ़ैसला नहीं हुआ तो हम और हमारे परिवार में से कोई वोट देने कोई नहीं जाएगा.

हम लोग दूसरों से पैसे ले लेकर घर चला रहे हैं. इस उम्र में हमें मां-बाप का सहारा बनना चाहिए और उन्हीं मां-बाप से पैसे लेकर हम घर चला रहे हैं. हम यहां किराए पर रह रहे हैं.

मैं इंजीनयरिंग डिपार्टमेंट में हूँ. इस कंपनी में मुझे 14 साल हो गए. पिछले तीन-चार महीने से हमें सैलरी नहीं मिली है.

ये वक्त बच्चों के एडमिशन का है. मेरा छह साल का बेटा है. मुझे उसकी 60 हज़ार रुपए फ़ीस जमा करनी है. मेरे पास इतना पैसा नहीं है.

Monday, April 15, 2019

दिल्ली के एम्स अस्पताल में महिलाओं से मारपीट: प्रेस रिव्यू

दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स के ट्रॉमा सेंटर में कुछ महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार का मामला सामने आया है.

इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के मुताबिक ट्रॉमा सेंटर पहुंचे एक परिवार के तीन सदस्यों को सुरक्षा गार्डों ने बुरी तरह पिटाई कर दी.

पुलिस ने हमला करने वालों में शामिल पांच लोगों की पहचान कर ली है और मामला दर्ज कर लिया है. पुलिस का कहना है कि एक बुजुर्ग और उनकी पत्नी और उनकी बहन को सुरक्षा गार्ड ने बुरी तरह मारा. इसके बाद जब बुजुर्ग ने गार्ड से विरोध दर्ज कराया तो बात और बढ़ गई. पुलिस का कहना है कि सारा मामला पास को लेकर हुआ था.

हिंदुस्तान की ख़बर के मुताबिक, पहले दौर का मतदान हो चुका है और आम आदमी पार्टी-कांग्रेस में कोई गठबंधन नहीं हो सका है लेकिन आम आदमी पार्टी अब भी लगातार कोशिश में है कि गठबंधन हो जाए.

गठबंधन नहीं होने की अटकलों के बीच अरविंद केजरीवाल ने कहा कि हमारे प्रयास अंत तक जारी रहेंगे. केजरीवाल ने कहा कि बीजेपी को हराने के लिए उनकी पार्टी से जो भी बन पड़ेगा, वो करेगी.

हिंदुस्तान के ही मुताबिक केंद्र सरकार ने जीएसटी में बढ़ोतरी के लिए एक नई योजना बनाई है. इसकी वजह से उन उपभोक्ताओं को नकद प्रोत्साहन या छूट दी जाएगी जो ख़रीद की रसीद लेंगे.

अधिकारियों ने बताया कि इस योजना के तहत ग्राहकों को चालान के कुल मूल्य के एक निश्चित प्रतिशत पर छूट दी जा सकती है. इससे ग्राहकों में बिल मांगने को प्रोत्साहन मिलेगा.

द हिंदू ने दिल्ली स्थित बाराखंभा इलाके में टिक टॉक वीडियो बनाने के दौरान हुई युवक की मौत की ख़बर को पहले पन्ने पर प्रकाशित किया है.

टिक टॉक ऐप पर पिस्टल हाथ में लेकर वीडियो बनाने के दौरान गोली चलने से कार चला रहे सलमान नाम के एक युवक की मौत हो गई. इस मामले में मृतक युवक के दो दोस्तों को हिरासत में ले लिया गया है.

रफ़ाल का मज़ाक
दैनिक भास्कर की एक ख़बर के अनुसार छत्तीसगढ़ के एक गांव में रफ़ाल मुद्दा बना हुआ है. लेकिन इसकी वजह राजनीतिक नहीं है.

दरअसल, राष्ट्रीय राजमार्ग 53 पर महासमुंद से क़रीब 1355 किलोमीटर दूर 150 परिवारों वाला एक गांव है, जिसका नाम रफ़ाल है.

अब ऐसे में आस-पास के गांव वाले यहां के गांव वालों का मज़ाक बनाते हैं कि अगर कांग्रेस सत्ता में आई तो.... जांच होगी.

Monday, April 8, 2019

रवांडा का वो नरसंहार जब 100 दिनों में हुआ था 8 लाख लोगों का क़त्लेआम

"जिस दिन मेरे बेटे की हत्या हुई, उस सुबह उसने अपने दोस्त से कहा था कि उसे लगता है कि कोई उसकी गर्दन काट देगा. जब-जब मुझे उसकी ये बात याद आती है तो मैं अंदर से टूट जाती हूं. उस दिन सेलिस्टिन दो हमलावरों के साथ मेरे घर में दाख़िल हुआ. उनके हाथों में लंबे-लंबे चाकू और तलवार नुमा हथियार थे. हमनें अपनी जान बचाकर घर से भागने की कोशिश की. लेकिन सेलिस्टिन ने अपने तलवार नुमा हथियार से मेरे दो बच्चों की गर्दनें काट दीं."

ये शब्द हैं रवांडा में तुत्सी और हूतू समुदायों के बीच हुए भयानक जनसंहार में ज़िंदा बचने वाली एक मां ऐन-मेरी उवीमाना के.

उवीमाना के बच्चों को मारने वाला शख़्स सेलिस्टन कोई और नहीं बल्कि उनका पड़ोसी था.

सेलिस्टिन की तरह ही हूतू समुदाय से जुड़े तमाम लोगों ने 7 अप्रैल 1994 से लेकर अगले सौ दिनों तक तुत्सी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले अपने पड़ोसियों, अपनी पत्नियों और रिश्तेदारों को जान से मारना शुरू कर दिया.

इस तरह इस जनसंहार में लगभग आठ लाख लोगों की मौत हुई. तुत्सी समुदाय की तमाम महिलाओं को सेक्स स्लेव बनाकर रखा गया.

इस नरसंहार में हूतू जनजाति से जुड़े चरमपंथियों ने अल्पसंख्यक तुत्सी समुदाय के लोगों और अपने राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाया.

रवांडा की कुल आबादी में हूतू समुदाय का हिस्सा 85 प्रतिशत है लेकिन लंबे समय से तुत्सी अल्पसंख्यकों का देश पर दबदबा रहा था.

साल 1959 में हूतू ने तुत्सी राजतंत्र को उखाड़ फेंका.

इसके बाद हज़ारों तुत्सी लोग अपनी जान बचाकर युगांडा समेत दूसरे पड़ोसी मुल्कों में पलायन कर गए.

इसके बाद एक निष्कासित तुत्सी समूह ने विद्रोही संगठन रवांडा पैट्रिएक फ्रंट (आरपीएफ़) बनाया.

ये संगठन 1990 के दशक में रवांडा आया और संघर्ष शुरू हुआ. ये लड़ाई 1993 में शांति समझौते के साथ ख़त्म हुई.

लेकिन छह अप्रैल 1994 की रात तत्कालीन राष्ट्रपति जुवेनल हाबयारिमाना और बुरुंडी के राष्ट्रपति केपरियल नतारयामिरा को ले जा रहे विमान को किगाली, रवांडा में गिराया गया था. इसमें सवार सभी लोग मारे गए.

किसने ये जहाज गिराया था, इसका फ़ैसला अब तक नहीं हो पाया है. कुछ लोग इसके लिए हूतू चरमपंथियों को इसके लिए ज़िम्मेदार मानते हैं जबकि कुछ लोग रवांडा पैट्रिएक फ्रंट (आरपीएफ़) को.

चूंकि ये दोनों नेता हूतू जनजाति से आते थे और इसलिए इनकी हत्या के लिए हूतू चरमपंथियों ने आरपीएफ़ को ज़िम्मेदार ठहराया. इसके तुरंत बाद हत्याओं का दौर शुरू हो गया.

आरपीएफ़ ने आरोप लगाया कि विमान को हूतू चरमपंथियों ने ही मार गिराया ताकि नरसंहार का बहाना मिल सके.

इस नरसंहार से पहले बेहद सावधानी पूर्व चरमपंथियों को सरकार की आलोचना करने वालों के नामों की सूची दी गई.

इसके बाद इन लड़ाकों ने सूची में शामिल लोगों को उनके परिवार के साथ मारना शुरू कर दिया.

हूतू समुदाय से जुड़े लोगों ने अपने तुत्सी समुदाय के पड़ोसियों को मार डाला. यही नहीं, कुछ हूतू युवकों ने अपनी पत्नियों को भी सिर्फ़ इसलिए ख़त्म कर दिया क्योंकि उनके मुताबिक़, अगर वो ऐसा न करते तो उन्हें जान से मार दिया जाता.

उस समय हर व्यक्ति के पास मौजूद पहचान पत्र में उसकी जनजाति का भी ज़िक्र होता था, इसलिए लड़ाकों ने सड़कों पर नाकेबंदी कर दी, जहां चुन-चुनकर तुत्सियों की धारदार हथियार से हत्या कर दी गई.

रवांडा बहुत ही नियंत्रित समाज रहा है, ज़िले से लेकर सरकार तक. उस समय की पार्टी एमआरएनडी की युवा शाखा थी 'इंतेराहाम्वे' जो लड़ाकों में तब्दील हो गई थी उसने ही इन हत्याओं को अंजाम दिया.

स्थानीय ग्रुपों को हथियार और हिट लिस्ट सौंपी गई, जिन्हें पता था कि उनके शिकार कहां मिलेंगे.

हूतू चरमपंथियों ने एक रेडियो स्टेशन स्थापित किया, 'आरटीएलएम' और एक अख़बार शुरू किया जिसने नफ़रत का प्रोगैंडा फैलाया. इनमें लोगों से आह्वान किया गया, 'तिलचट्टों को साफ़ करो' मतलब तुत्सी लोगों को मारो.

जिन प्रमुख लोगों को मारा जाना था उनके नाम रेडियो पर प्रसारित किए गए.

यहां तक कि पादरी और ननों का भी उन लोगों की हत्याओं में नाम आया, जो चर्चों में शरण मांगने गए थे.

रवांडा में संयुक्त राष्ट्र और बेल्जियम की सेनाएं थीं लेकिन उन्हें हत्याएं रोकने की इजाज़त नहीं दी गई.

सोमालिया में अमरीकी सैनिकों की हत्या के एक साल बाद अमरीका ने तय किया था कि वो अफ़्रीकी विवादों में नहीं पड़ेगा.

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