भारत में अगर कोई महिला गर्भधारण के 20 हफ्तों यानि पांच महीने बाद गर्भपात कराना चाहे, तो क्या वो ऐसा कर सकती है.
जवाब है नहीं, वर्तमान नियमों के अनुसार ऐसा कर पाना संभव नहीं है या कोई विशेष परिस्थिति है तो उसके लिए कोर्ट की इजाज़त लेनी पड़ती है.
लेकिन, हाल ही में आए मद्रास हाई कोर्ट के एकआदेश को अगर अमल में लाया गया तो ऐसा हो पाना संभव होगा.
मद्रास हाई कोर्ट ने एक न्यूज़ रिपोर्ट के आधार के पर स्वत: संज्ञान लेते हुए भारत सरकार से मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेंग्नेंसी (एमटीपी) एक्ट, 1971 में संशोधन करने के लिए कहा है.
कोर्ट ने भारत सरकार से पूछा है कि गर्भपात की समयसीमा को 20 हफ़्ते से बढ़ाकर 24 हफ़्ते करने के लिए संशोधन करने में कितना समय लगेगा.
भारत सरकार को जून तक इस पर जवाब देना है.
इस मामले की शुरुआत बॉम्बे हाईकोर्ट से हुई थी, जब तीन महिलाओं ने याचिका दायर कर 20 हफ़्तों के बाद भी गर्भपात कराने की अनुमति देने की मांग की थी.
भारत में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेंग्नेंसी एक्ट के मुताबिक 20 हफ़्ते के बाद गर्भपात कराना गैर-क़ानूनी है.
लेकिन, इन महिलाओं का मामला सुनने और डॉक्टर की राय जानने के बाद कोर्ट ने उन्हें गर्भपात की अनुमति दे दी.
न्यायाधीश एएस ओका और एमएस सोनक की डिविजन बेंच ने आदेश दिया कि एक पंजीकृत चिकित्सक बिना हाई कोर्ट की इजाज़त के 20 हफ़्तों से ज़्यादा के गर्भधारण में गर्भपात कर सकता है, अगर उसकी राय में उस समय गर्भपात करना महिला की जान बचाने के लिए तत्काल ज़रूरी है.
लेकिन, अन्य किसी स्थिति में महिलाएं 20 हफ्तों बाद गर्भपात नहीं करा सकतीं.
ऐसे कई मामले पहले भी आते रहे हैं. बलात्कार से जुड़े मामलों में भी पांच महीनों बाद गर्भपात की इजाज़त मांगी गई है. साथ ही 2014 में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेंग्नेंसी एक्ट में भी इससे जुड़े संशोधन की बात कही गई थी.
गर्भपात की समयसीमा का मुद्दा समय-समय पर उठता रहता है. ऐसे में हमने इसके अलग-अलग पक्षों की पड़ताल की कि 20 हफ़्ते और 24 हफ़्ते के गर्भपात में क्या अंतर है और गर्भपात कानून में बदलाव की ज़रूरत क्यों महसूस हो रही है.
जब गर्भधारण 12 हफ़्ते से ज्यादा का ना हो. इसमें एक चिकित्सक ने अच्छी भावना के साथ गर्भपात की राय दी हो.
जब गर्भधारण 12 हफ़्ते से ज्यादा लेकिन 20 हफ़्ते तक हो. ऐसी स्थिति में दो चिकित्सकों की राय की ज़रूरत होती है.
20 हफ़्ते तक की समयसीमा में इन स्थितियों में गर्भपात कराया जा सकता है-
अगर मां की जान को या शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर चोट पहुंचने का ख़तरा हो.
अगर बच्चे की जान को या शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर चोट पहुंचने का ख़तरा हो.
अगर बलात्कार के कारण गर्भ ठहर गया हो.
अगर गर्भनिरोधक के उपाय के बावजूद, शादीशुदा महिला का गर्भ ठहर गया हो.
मौजूदा क़ानून के बावजूद गर्भपात के समय को 20 से ज़्यादा या 24 हफ़्तों में किए जाने की मांग भी उठ रही हैं.
इसके कारणों पर मैक्स अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. मंजू खेमानी कहती हैं, ''कुछ दोष ऐसे होते हैं जो गर्भधारण के 20 हफ़्ते में पता नहीं चल पाते जैसे डायफ्रैगमैटिक हर्निया और माइक्रोसैफली आदि. इनका पता ही देर से चलता है.''
''ये नियम इसलिए बनाया गया होगा क्योंकि 20 हफ़्ते तक बच्चा इतना विकसित हो जाता है कि उसके बारे में काफी कुछ पता चल सके. लेकिन, जैसे-जैसे तकनीक आधुनिक हुई है तो आगे के हफ़्तों में कुछ और समस्याएं भी सामने आ जाती हैं.''
वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर और सफदरजंग अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. दिव्या पांडे इसके तकनीकी पहलुओं को और विस्तार से बताती हैं.
वह कहती हैं, ''बच्चे में विसंगति का पता लगाने के लिए एक लेवल टू स्कैन कराया जाता है जिसका सबसे अच्छा समय 18 से 22 हफ़्ते है. यह जन्मजात बीमारी का पता लगाने के लिए किया जाता है. ''
''लेकिन एमटीपी एक्ट में 20 हफ्ते तक ही गर्भपात की इजाज़त है इसलिए 20 हफ़्ते से पहले ही लेवल टू स्कैन करा लेते हैं.''
डॉक्टर दिव्या पांडे बताती हैं, ''अगर स्कैन की तकनीक के हिसाब से देखें तो 22 हफ्तों में और ज़्यादा बेहतर नतीजे आते हैं. हर हफ्ते बच्चा विकसित होता जाता है. इससे रेडियोलॉजिकल व्यू अच्छा होता जाता है.''
''जैसे दिल का ईको 24 हफ़्ते होने पर करने की सिफारिश की जाती है. इससे दिल की विसंगतियां ज़्यादा पता चलती हैं. लेकिन, हम 18 हफ़्तों में स्कैन कराने की सलाह देते हैं ताकि जरूरत पड़ने पर क़ानूनी के दायरे में गर्भपात किया जा सके.''
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